🎙️ मुशायरा – साझी विरासत

"मुशायरा – साझी विरासत" केवल एक आयोजन नहीं था — यह हमारे साझा साहित्यिक जड़ों का एक आत्मीय उत्सव था। मंच एक महफ़िल बन गया जहाँ हिंदी और उर्दू के शायर एकत्र हुए, शायरी, नज़्म, और कविता की समृद्ध परंपराओं को पुनः जीवित करने के लिए।

अनुभवी और नए दोनों स्वर प्रेम, प्रतिरोध, शांति और सांस्कृतिक गर्व की शाश्वत कहानियाँ गूंजाते रहे। प्रत्येक शेर और stanza के साथ, दर्शकों को एक ऐसी दुनिया में ले जाया गया जहाँ भाषा एकता का प्रतीक थी, विभाजन का नहीं।

यह मुशायरा हमारी मिश्रित संस्कृति (गंगा-जमुनि तहज़ीब) का प्रतीक था, जो हमें यह याद दिलाता है कि कविता की कोई सीमा नहीं होती — केवल भावनाएँ होती हैं।

🎙️ मुशायरा – साझी विरासत

मुशायरा – साझी विरासत की झलकियाँ

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